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आखिर पितृपक्ष में कौओं की इतनी मनुहार क्यों होती है?

Facts about crow in Pitru paksha

श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही हर कोई अपने पूर्वजो को याद कर रहा हैं. घर पर श्राद्ध के लिए विशेष रूप से बनाए गए भोजन का एक अंश कौओं के लिए भी होता है.

पूजा के बाद बड़े-बुजुर्ग घर की छत पर जा कर कौओं को आवाजें देकर आमंत्रित करते हैं, आम तौर देखा जाता है की हमसे दूरी बनाए रखने वाले कौए श्राद्ध पक्ष में आवाज सुनते ही नजदीक आ जाते हैं, और मजे से उन व्यंजनों का स्वाद लेते हैं. उस समय मन में जिज्ञासा जगती है, कि आखिर पितृपक्ष में इन कौओं की इतनी मनुहार क्यों होती है

इस संदर्भ के पीछे देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत से जुड़ी एक कथा प्रचलित हैं. एक दिन मां सीता को चंचल स्वभाव के जयंत ने कहीं देख लिया. माता सीता के मोहक रूप पर वह आसक्त हो गए. उन्होंने कौए का रूप धारण कर माता के पास जा पहुचे. माता ने जब उनकी बातें सुनी तो उन्हें दुत्कार दिया, जिस पर जयंत को भानकर गुस्सा आ गया. उन्होंने सीताजी को चोंच मार दी, तभी श्री राम भी वहा आ पहुंचे.

उन्होंने कौआ बने जयंत को देखा तो अपना ब्रह्मास्त्र चलाया तो जयंत अपने असल रूप में आ गए. उस समय सीता माता और श्री राम से क्षमा मांगी तो प्रभु श्री राम ने उन्हें क्षमा तो किया , साथ में वरदान देते हुए कहा की जब भी लोग अपने पित्तरों को भोजन देंगे, तो पहले कौओं को भोजन देंगे और कौए के माध्यम से ही उनके पित्तर आहार ग्रहण कर पाएंगे.

प्रभु श्रीराम के वरदान से इस परंपरा की शुरूआत हुई. श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन का एक भाग बड़ी श्रद्धा के साथ निकालते हैं, जिसे काक बलि कहा जाता है. यह भोजन हम कौओं को परोसते हैं.

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